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देश के तीसरे विरुपाक्ष महादेव मंदिर को निखारने की तैयारी

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रतलाम। ऐतिहासिक विरुपाक्ष महादेव मंदिर (MAHADEV MANDIR) का रूप निखारने और इसे विकसित किए जाने की तैयारी है। यह देश के तीन विरुपाक्ष महादेव मंदिरों में से एक है। इस मौर्यकालीन मंदिर के विकास के लिए मास्टर प्लान तैयार कर लिया गया है। परियोजना अधिकारी (शहरी विकास अधिकरण) अरुण पाठक के अनुसार दो अन्य विरुपाक्ष महादेव मंदिर कर्नाटक के हम्पी, पट्टाडकल में स्थित हैं।

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ये दोनों विश्व धरोहर में भी शामिल हैं। जिला मुख्यालय से 18 किमी दूर बिलपांक गांव में स्थित इस मंदिर (MAHADEV MANDIR) के जीर्णोद्धार के लिए बुधवार को सांसद गुमानसिंह डामोर की अध्यक्षता में बैठक हुई। कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने मंदिर के विकास के मास्टर प्लान का प्रजेंटेशन दिया। 10 हजार वर्गफीट क्षेत्र में मंदिर व अन्य निर्माण कार्य किए जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि पूरे परिसर को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जाएगा।

चार करोड़ रुपये होगा खर्च

जनसहयोग से करीब चार करोड़ रुपये की लागत से मंदिर (MAHADEV MANDIR)व पूरे परिसर को श्रद्धालुओं के लिए तैयार किया जाएगा। इसी माह काम शुरू होने की संभावना है। ऐसे बनी बात रखरखाव में लापरवाही व अतिक्रमण के चलते मंदिर का स्वरूप बिगड़ने लगा था। इसके आसपास बने भवन भी इसकी भव्यता लौटाने में बाधक बन रहे थे।

कलेक्टर ने इसे चिह्नित किया और रतलाम ग्रामीण क्षेत्र के विधायक दिलीप मकवाना, कृषक आयोग के पूर्व अध्यक्ष ईश्वरलाल पाटीदार आदि ने सितंबर 2021 में ग्रामीणों को भवन व अन्य निर्माण हटाने के लिए तैयार कर लिया। प्रभावितों को गांव में ही अन्य स्थान पर जमीन देकर उनके घर के लिए भूमिपूजन भी करवा दिया गया।

मंदिर की विशेषता

मंदिर परमार, गुर्जर, चालुक्य (गुजरात) की सम्मिश्रित शिल्पशैली का अनुपम उदाहरण है। इसमें गर्भ गृह, अर्द्ध मंडप, सभा मंडप हैं। सभा मंडप में स्थापित मौर्यकालीन स्तंभ इसके इस काल में बने होने का प्रमाण देता है। – मध्य में मुख्य मंदिर के कोनों में चार लघु मंदिर है।

पंचायतन शैली के मंदिर में जैन, सनातन, बौद्ध, मुस्लिम शिल्पकला का बेहतर सम्मिश्रण नजर आता है। मंदिर निर्माण संबंधी प्रमाण अब तक उपलब्ध नहीं हो पाए हैं, लेकिन वर्ष 1964 में बिलपांक में ही खोदाई के दौरान प्राप्त एक शिलालेख इस तथ्य की पुष्टि करता है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार संवत 1198 में गुजरात के चक्रवर्ती राजा सिद्धराज जयसिंह द्वारा मालवा राज्य को जीतने के बाद जाते समय करवाया गया था। मंदिर 64 स्तंभ (खंभों) पर मंदिर बना हुआ है और मान्यता है कि कोई इनको गिन नहीं पाता है।